भारत के 29 राज्यों में सिर्फ़ एक महिला मुख्यमंत्री होने के क्या मायने हैं?
पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद कई चीज़ें बदली हैं. एक बदलाव ये भी है कि अब भारत के 29 राज्यों में सिर्फ़ एक महिला मुख्यमंत्री होगी.
राजस्थान की सत्ता वसुंधरा राजे के हाथों से फिसल चुकी है और इसलिए अब सिर्फ़ पश्चिम बंगाल ऐसा राज्य है जहां एक महिला मुख्यमंत्री है- ममता बनर्जी.
तक़रीबन दो साल पहले भारत के चारों कोनों में एक-एक महिला मुख्यमंत्री थी. आज ये आकंड़ा चार से सिमट कर एक पर आ गया है
साल 2011 और साल 2014 में ऐसा हुआ था कि भारत के चार राज्यों की ज़िम्मेदारी महिला मुख्यमंत्रियों के हाथों में थी.
जम्मू-कश्मीर में महबूबा मुफ़्ती, गुजरात में आनंदीबेन पटेल, राजस्थान में वसुंधरा राजे और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी. इससे पहले तमिलनाडु में जयललिता भी थीं.
भारतीय राजनीति पर नज़र रखने वाली वरिष्ठ पत्रकार स्मिता सिंह इसे भारतीय महिलाओं के लिए अच्छा संकेत नहीं मानतीं.
आज़ादी के बाद से अब तक भारत में कुल 16 महिला मुख्यमंत्री हुई हैं जिनमें उमा भारती, राबड़ी देवी और शीला दीक्षित जैसे नाम शामिल हैं.
स्मिता सिंह ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "भले ही भारत में महिला मुख्यमंत्रियों की संख्या उंगलियों पर गिने जाने भर की रही हो, हम इससे इनकार नहीं कर सकते कि जयललिता और मायावती जैसी महिलाएं सबसे ताक़तवर मुख्यमंत्रियों में से रही हैं. दोनों ने एक से ज़्यादा बार मुख्यमंत्री का पदभार संभाला है. दोनों का ही कार्यकाल काफ़ी प्रभावी रहा है. फिर चाहे वो तमिलनाडु में जयललिता की जनवादी योजनाएं हों या उत्तर प्रदेश में मायावती का क़ानून-व्यवस्था को क़ाबू में करना."
स्मिता मानती हैं कि एक के बाद एक लगातार कई राज्यों में महिला मुख्यमंत्रियों का आना एक स्वस्थ परंपरा की शुरुआत थी और ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि यह परंपरा इतनी जल्दी टूटती नज़र आ रही है.
इंटर पार्लियामेंटरी यूनियन (IPU) और यूएन वीमन रिपोर्ट के मुताबिक़ साल 2017 में भारत में महिलाओं की लोकसभा में सिर्फ़ 11.8% और राज्यसभा में सिर्फ़ 11% भागीदारी थी.
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक अदिति फड़नीस की राय इस मुद्दे पर थोड़ी अलग है.
अदिति कहती हैं, "ये माना जाता है कि महिलाएं शीर्ष पदों पर होंगी तो महिलाओं के हित में फ़ैसले लेंगी लेकिन इसे पूरा सच नहीं माना जा सकता. इंदिरा गांधी जब देश की प्रधानमंत्री थीं तब कोई क्रांति नहीं आ गई या जिन राज्यों में महिलाएं मुख्यमंत्री थीं वहां महिलाओं की स्थिति बहुत अच्छी हो, ऐसा भी नहीं है. ये भी नहीं कह सकते कि पुरुष राजनेता महिलाओं के हक़ में फ़ैसले ले ही नहीं सकते."
हालांकि अदिति ये भी मानती हैं कि जितनी ज़्यादा महिलाएं फ़ैसले लेने की स्थिति में होंगी, फ़ैसलों में उतनी ज़्यादा संवेदनशीलता और बराबरी होगी.
राजस्थान की सत्ता वसुंधरा राजे के हाथों से फिसल चुकी है और इसलिए अब सिर्फ़ पश्चिम बंगाल ऐसा राज्य है जहां एक महिला मुख्यमंत्री है- ममता बनर्जी.
तक़रीबन दो साल पहले भारत के चारों कोनों में एक-एक महिला मुख्यमंत्री थी. आज ये आकंड़ा चार से सिमट कर एक पर आ गया है
साल 2011 और साल 2014 में ऐसा हुआ था कि भारत के चार राज्यों की ज़िम्मेदारी महिला मुख्यमंत्रियों के हाथों में थी.
जम्मू-कश्मीर में महबूबा मुफ़्ती, गुजरात में आनंदीबेन पटेल, राजस्थान में वसुंधरा राजे और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी. इससे पहले तमिलनाडु में जयललिता भी थीं.
भारतीय राजनीति पर नज़र रखने वाली वरिष्ठ पत्रकार स्मिता सिंह इसे भारतीय महिलाओं के लिए अच्छा संकेत नहीं मानतीं.
आज़ादी के बाद से अब तक भारत में कुल 16 महिला मुख्यमंत्री हुई हैं जिनमें उमा भारती, राबड़ी देवी और शीला दीक्षित जैसे नाम शामिल हैं.
स्मिता सिंह ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "भले ही भारत में महिला मुख्यमंत्रियों की संख्या उंगलियों पर गिने जाने भर की रही हो, हम इससे इनकार नहीं कर सकते कि जयललिता और मायावती जैसी महिलाएं सबसे ताक़तवर मुख्यमंत्रियों में से रही हैं. दोनों ने एक से ज़्यादा बार मुख्यमंत्री का पदभार संभाला है. दोनों का ही कार्यकाल काफ़ी प्रभावी रहा है. फिर चाहे वो तमिलनाडु में जयललिता की जनवादी योजनाएं हों या उत्तर प्रदेश में मायावती का क़ानून-व्यवस्था को क़ाबू में करना."
स्मिता मानती हैं कि एक के बाद एक लगातार कई राज्यों में महिला मुख्यमंत्रियों का आना एक स्वस्थ परंपरा की शुरुआत थी और ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि यह परंपरा इतनी जल्दी टूटती नज़र आ रही है.
इंटर पार्लियामेंटरी यूनियन (IPU) और यूएन वीमन रिपोर्ट के मुताबिक़ साल 2017 में भारत में महिलाओं की लोकसभा में सिर्फ़ 11.8% और राज्यसभा में सिर्फ़ 11% भागीदारी थी.
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक अदिति फड़नीस की राय इस मुद्दे पर थोड़ी अलग है.
अदिति कहती हैं, "ये माना जाता है कि महिलाएं शीर्ष पदों पर होंगी तो महिलाओं के हित में फ़ैसले लेंगी लेकिन इसे पूरा सच नहीं माना जा सकता. इंदिरा गांधी जब देश की प्रधानमंत्री थीं तब कोई क्रांति नहीं आ गई या जिन राज्यों में महिलाएं मुख्यमंत्री थीं वहां महिलाओं की स्थिति बहुत अच्छी हो, ऐसा भी नहीं है. ये भी नहीं कह सकते कि पुरुष राजनेता महिलाओं के हक़ में फ़ैसले ले ही नहीं सकते."
हालांकि अदिति ये भी मानती हैं कि जितनी ज़्यादा महिलाएं फ़ैसले लेने की स्थिति में होंगी, फ़ैसलों में उतनी ज़्यादा संवेदनशीलता और बराबरी होगी.
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