सहमे विपक्ष की मोदी सरकार के खिलाफ मोर्चेबंदी, सपा के दर्द पर बसपा ने बहाए आंसू

उत्तर प्रदेश की सियासत में नई इबारत लिखी जाने लगी है. लोकसभा चुनाव 2019 के लिए सपा-बसपा गठबंधन की कवायद के बीच दोनों दलों के नेता एक साथ खड़े नजर आ रहे हैं. अवैध खनन मामले को लेकर सीबीआई अखिलेश यादव पर शिकंजा कसने के मूड में दिखी तो दर्द सपा को ही नहीं बल्कि बसपा और कांग्रेस को भी होने लगा है. यही वजह है कि अखिलेश के बचाव में बसपा के महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा और कांग्रेस के महासचिव गुलाम नबी आजाद खुलकर खड़े हो गए हैं.

सपा-बसपा के इतिहास में 1993 के बाद पहली बार है जब सपा के ऊपर परेशानी आई तो बसपा ढाल बनकर आगे सामने आई है. संसद परिसर में सोमवार को सपा के महासचिव राम गोपाल यादव और बसपा के सतीश चंद्र मिश्रा ने एक साथ बीजेपी पर हमला बोला. वहीं कांग्रेस की ओर से गुलामी नबी आजाद भी अखिलेश के पक्ष में खड़े नजर आए और कहा कि मोदी सरकार विरोधी पार्टियों के खिलाफ एजेंसी को पीछे लगा कर डराने और धमकाने का काम कर रही है.

राम गोपाल यादव ने कहा कि  अभी SP-BSP का गठबंधन हुआ नहीं है, उससे पहले ही सरकार ने सीबीआई के तोते के साथ गठबंधन कर लिया है. केंद्र सरकार के इशारे पर चुनाव से पहले CBI का दुरुपयोग किया जा रहा है. समाजवादी पार्टी और उनके सहयोगी अगर सड़क पर आएंगे तो बीजेपी वालों का सड़क पर चलना मुश्किल हो जाएगा और मोदी को बनारस छोड़कर दूसरी सीट से चुनाव लड़ना पड़ जाएगा.

बसपा नेता सतीश चंद्र मिश्रा ने अखिलेश का बचाव करते हुए कहा कि मुद्दों से भटकाने के लिए सीबीआई का दुरुपयोग किया जा रहा है. बीजेपी की हताशा का आलम यह है कि मोदी सरकार ने सीबीआई से गठबंधन कर लिया है. आज इन लोगों ने सीबीआई जैसी संस्था को धराशायी कर दिया है.

कांग्रेस के राज्यसभा सांसद गुलाम नबी आजाद ने भी मोदी सरकार पर सीबीआई के दुरुपयोग का आरोप लगाते हुए कहा कि यह पहली बार नहीं हो रहा है. आज नई पार्टी के नेता निशाने पर हैं इससे पहले हमारे नेताओं को भी एजेंसी का दुरुपयोग कर निशाना बनाया गया है. उन्होंने कहा कि चुनाव से ऐन पहले पौने 5 साल बाद अखिलेश यादव के खिलाफ यह कार्रवाई शुरू की गई है ताकि गठबंधन ना किया जाए या गठबंधन जीत का कारण ना बने. मोदी सरकार टीएमसी, डीएमके सहित कई विपक्षी दलों को डराने का काम कर रही है, जिसकी कांग्रेस पार्टी निंदा करती है.

दिलचस्प बात ये है कि पिछले 23 सालों के दौरान बसपा और सपा इस तरह एक दूसरे के लिए खड़ी नजर नहीं आई हैं. ये पहली बार है जब एक दूसरे के साथ आए हैं. अखिलेश पक्ष में बसपा के साथ आने के राजनीतिक मायने भी है. गठबंधन की घोषणा से पहले दोनों पार्टियों ने संकेत दे दिए हैं कि अब दोनों पार्टियां एक दूसरे के लिए संघर्ष करने को तैयार हैं. इससे सपा-बसपा के पार्टी कार्यकर्ताओं को भी एक संदेश गया है, जब नेता एक हैं तो कार्यकर्ता भी एक हों.

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